उफ़ विडम्बना। ये कैसा साया है जिस्का इंतज़ार अँधेरे में कर रहे हो।
पहचान गुम गयी है इस भीड़ में मेरी,खुद से मुझ तक का ताल्लुक़ भूल गयी थी।अब तो बस रात की राह देखता हूँ,शायद किसी रोज़ मख़मूर ही लौट आए।
उफ़ विडम्बना। ये कैसा साया है जिस्का इंतज़ार अँधेरे में कर रहे हो।
ReplyDeleteपहचान गुम गयी है इस भीड़ में मेरी,
Deleteखुद से मुझ तक का ताल्लुक़ भूल गयी थी।
अब तो बस रात की राह देखता हूँ,
शायद किसी रोज़ मख़मूर ही लौट आए।