If only I could slash you open with my pen and spill your life's ink on the parchment that has now dried...

March 06, 2014

साया भटक गया है मेरा

साया भटक गया है मेरा,
दरीचे पर कोहनी टिकाये खड़ा हूँ,
कि देखूँ दिन कब ढलेगा,
रात कब आएगी। 

देखूँ दिन कब ढलेगा, 
रात कब आएगी।
इन सडकों को खाली देख कर,
क्या पता घर लौट आये।

दानिस्ता-नादानिस्ता

दिखावे का शौक हो गया है,
सदाकत छूट गयी है कब की।
शायरी भी चकमा देने लग गयी है अब तो,
लफ्ज़ कागज़ पर उतारे नहीं उतरते।

नज़्म जो पॉकेट में रख कर भूल गया था,
कल मैले कपडों संग धुल जाएगी।
यूँ कहिये की कोशिश तो करता हूँ पूरी, बस
दानिस्ता-नादानिस्ता कलम छूठ जाती है।

रिश्तेदार दोस्त भी मिलते हैं
तो पूछते हैं मियाँ क्या इरादा है,
कब तक खोखले नगमे सुनाओगे?

मैं कहता हूँ जो कहता हूँ हर बार।
वोह कहते हैं की कुछ कर के भी बताओ भाइ।