दिखावे का शौक हो गया है,
सदाकत छूट गयी है कब की।
शायरी भी चकमा देने लग गयी है अब तो,
लफ्ज़ कागज़ पर उतारे नहीं उतरते।
नज़्म जो पॉकेट में रख कर भूल गया था,
कल मैले कपडों संग धुल जाएगी।
यूँ कहिये की कोशिश तो करता हूँ पूरी, बस
दानिस्ता-नादानिस्ता कलम छूठ जाती है।
रिश्तेदार दोस्त भी मिलते हैं
तो पूछते हैं मियाँ क्या इरादा है,
कब तक खोखले नगमे सुनाओगे?
मैं कहता हूँ जो कहता हूँ हर बार।
वोह कहते हैं की कुछ कर के भी बताओ भाइ।
सदाकत छूट गयी है कब की।
शायरी भी चकमा देने लग गयी है अब तो,
लफ्ज़ कागज़ पर उतारे नहीं उतरते।
नज़्म जो पॉकेट में रख कर भूल गया था,
कल मैले कपडों संग धुल जाएगी।
यूँ कहिये की कोशिश तो करता हूँ पूरी, बस
दानिस्ता-नादानिस्ता कलम छूठ जाती है।
रिश्तेदार दोस्त भी मिलते हैं
तो पूछते हैं मियाँ क्या इरादा है,
कब तक खोखले नगमे सुनाओगे?
मैं कहता हूँ जो कहता हूँ हर बार।
वोह कहते हैं की कुछ कर के भी बताओ भाइ।
यूँ कहिये की कोशिश तो करता हूँ पूरी, बस
ReplyDeleteदानिस्ता-नादानिस्ता कलम छूठ जाती है। -- ये समझाओ
यूँ कहिये की कोशिश तो करता हूँ पूरी, बस
Deleteजाने-अन्जाने कलम छूठ जाती है।
Excuses, भइया, excuses.
Siddhant ne padhwa diya mujhko.
ReplyDeleteAb ek hi baat reh gayi hai kehne ko, miya kab tak khokhle nagme sunaoge ?